अंतर्वेदी में दिखा यह सीन हमारे समाज के लिए एक कड़ी चेतावनी है। जो जानवर ज़िंदा रहते हुए खाने की तलाश में था, आखिर में हमारे फेंके गए प्लास्टिक कचरे का शिकार हो गया। भूख से तड़पते हुए प्लास्टिक की थैलियों को खाना समझकर निगलने वाले इस जानवर की जान चली गई। भले ही शरीर सड़ गया हो और सिर्फ़ कंकाल बचा हो, लेकिन प्लास्टिक का बचा रहना चिंता की बात है। हमारे लापरवाही से फेंके गए प्लास्टिक की वजह से हर दिन हज़ारों जानवर ऐसी ही स्थिति का सामना कर रहे हैं। कोई भी जीवित प्राणी, जैसे भैंस, कुत्ते और पक्षी, इसका शिकार हो सकते हैं। यह समस्या और भी बदतर होती जा रही है, खासकर ग्रामीण इलाकों में। हालांकि प्लास्टिक हमें सुविधा देता है, लेकिन साथ ही यह प्रकृति के लिए एक अभिशाप बन गया है। जिन प्लास्टिक थैलियों और बोतलों को हम एक बार इस्तेमाल करके फेंक देते हैं, उन्हें प्रकृति में गलने में सैकड़ों साल लग जाते हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रकृति को बचाने का मतलब है खुद को बचाना.... K.V.SHARMA EDITOR
जनवरी 1966 की वो रात, जब ताशकंद में लाल बहादुर शास्त्री जी की मौत हुई, तो पूरा देश रो पड़ा था। लेकिन हैरानी तो तब हुई जब उनकी मौत के बाद उनकी संपत्ति का हिसाब हुआ। लोग सोच रहे थे कि जो इंसान देश का 'प्रधान' था, जिसके एक दस्तखत से करोड़ों-अरबों के फैसले होते थे, उसने अपने परिवार के लिए क्या छोड़ा होगा? जब जाँच हुई, तो जो सच सामने आया उसने सबकी आँखों में आँसू ला दिए दिल्ली की बड़ी कोठियों में रहने वाले इस शख्स के नाम अपनी एक इंच जमीन तक नहीं थी। उनकी अलमारी में बस कुछ खादी के कुर्ते मिले। आपको जानकर हैरानी होगी कि उनमें से कई कुर्ते फटे हुए थे, जिन्हें उनकी पत्नी ललिता जी ने खुद रफू (Stitch) किया था। उनके खाते में इतने पैसे भी नहीं थे कि एक पुरानी कार की किश्त (EMI) चुकाई जा सके। सबसे भावुक कर देने वाली बात तो ये थी कि शास्त्री जी ने अपने बच्चों के कहने पर एक 'फिएट कार' लोन लेकर खरीदी थी। उनकी मौत के बाद उस कार का 5,000 रुपये का कर्ज बाकी था। जिसे बाद में उनकी पत्नी ने अपनी पेंशन के एक-एक पैसे जोड़कर चुकाया। 💔 जिस इंसान के एक कहने पर पूरा देश "एक वक्त का उपवास" रख...