ओला चलाता हूँ ।ज़्यादातर नाइट शिफ्ट करता हूँ।पिछले हफ्ते रात ग्यारह बजे एक बुज़ुर्ग सज्जन को उठाया । सफ़ेद पंजाबी, धोती, आँखों में थकान—लेकिन आवाज़ में अजीब-सी दृढ़ता ।*
गाड़ी में बैठते ही बोले,
*“आज रात मुझे पाँच जगहों पर ले चलना होगा । मैं तुम्हें 5000 रुपये दूँगा । नकद । लेकिन अंत तक कारण मत पूंछना ।”*
यह कहकर एक कागज़ आगे बढ़ाया । उस पर पाँच पते लिखे थे ।
*पहला पड़ाव-*
दक्षिण कोलकाता का एक पुराना घर ।
मैंने गाड़ी रोकी । वे उतरे नहीं । सिर्फ़ खिड़की का शीशा नीचे करके देखते रहे । दस मिनट तक ।
आँखों से निरंतर आँसू बह रहे थे, लेकिन कोई आवाज़ नहीं ।
“चलो… अगला ।”
*दूसरा पड़ाव-*
एक प्राथमिक विद्यालय । गेट बंद । अंदर अँधेरा मैदान ।
वे उतरकर धीरे-धीरे झूले तक गए । एक झूले पर बैठकर हल्के-हल्के झूलने लगे ।
बीस मिनट बाद लौटे । बोले -
“यहीं पढ़ाता था । तैंतालीस साल । ज़िंदगी का सबसे अच्छा समय यही था ।”
*तीसरा पड़ाव-*
एक छोटा पुराना कॉफ़ी हाउस ।
अंदर जाकर एक कप चाय मँगाई । कोने की मेज़ पर अकेले बैठे रहे । चाय को छुआ तक नहीं । बस चारों ओर देखते रहे ।
पंद्रह मिनट बाद लौटकर हल्के से मुस्कुराए -
“यहीं, मेरी और मिताली (उनकी पत्नी) की पहली मुलाक़ात हुई थी । 1969 में ।”
*चौथा पड़ाव-*
निमतला श्मशान घाट ।
वे उतरे । चिताभस्म के पास एक फ़लक के सामने खड़े होकर धीमे-धीमे कुछ बोलते रहे । मैं सुन नहीं पाया ।
आधे घंटे बाद लौटे । आँखें लाल थीं ।
“आज तीन साल हो गए उसे गए ।”
*पाँचवाँ पड़ाव-*
एक बड़ा सरकारी अस्पताल ।
गाड़ी पार्क करने को कहा । फिर मेरी ओर देखा -
*“अब कारण बताता हूँ । मुझे चौथे स्टेज का कैंसर है । डॉक्टर ने कहा है— कुछ हफ़्ते… शायद कुछ दिन । आज मैं अपनी पूरी ज़िंदगी आख़िरी बार देख लेना चाहता था ।”*
मैं स्टीयरिंग पर सिर रखकर रोने लगा ।
उन्होंने कहा—
*“वो घर—जहाँ बच्चों को बड़ा किया ।*
*वो स्कूल—जहाँ अपना उद्देश्य पाया ।*
*वो कॉफ़ी हाउस—जहाँ प्यार हुआ ।*
*वो श्मशान—जहाँ आख़िरी विदाई दी ।*
*और ये अस्पताल—जहाँ आज भर्ती होऊँगा । अब घर वापसी नहीं होगी ।”*
उन्होंने मेरे हाथ में 5000/- रुपये रख दिए ।
*“धन्यवाद । तुमने मुझे मेरी ज़िंदगी एक बार फिर घुमा दी । मेरे आख़िरी अजनबी इंसान...जिसने मेरे साथ कोमल व्यवहार किया ।”*
मैंने कहा—
“नहीं दादू, ये मैं नहीं ले सकता ।”
वे बोले—
*“लो । देने के लिए मेरा कोई नहीं । बच्चों ने इतनी दूरी बना ली है कि अब वो बात नहीं करते । यार-दोस्त कोई बचा नहीं, एक-एक करके सब विदा हो गये । तुमने तीन घंटे दिए—तीन घंटे की इंसानियत । उसकी कीमत पैसे से ज़्यादा है ।”*
छोटा सूटकेस लेकर वे अंदर चले गए ।
*अगले दिन मैं अस्पताल गया । पूछा—“श्री अनिरुद्ध मुखर्जी । केबिन 412” ।*
फूल लेकर अंदर गया । मुझे देखकर मुस्कुराए —
“तुम आए?”
“आपको ऐसे छोड़ नहीं पाया।”
*दो घंटे बातें हुईं—मिताली देवी की, उनके छात्रों की, उनके रूठे हुए बच्चों की ।*
मैं रोज़ जाने लगा । चाय ले जाता । अख़बार पढ़कर सुनाता । कभी चुपचाप बैठा रहता ।
एक दिन बोले—
*“सोचता था अकेला मरूँगा । लेकिन तुम हो । आख़री वक़्त में एक अजनबी, परिवार बन गया । तुम्हें मेरा बहुत-बहुत आशीर्वाद ।”*
मैंने उनका हांथ पकड़ा—
“आप अकेले नहीं हैं ।”
*मंगलवार भोर 3 बजकर 17 मिनट पर वे स्वर्ग चले गए ।*
*मैं उनका हांथ पकड़े बैठा था ।*
आख़िरी शब्द थे—
*“सबसे कहना… अजनबियों की ओर देखना । सचमुच देखना । हम सब कहीं जा रहे हैं—कोई तेज़, कोई धीरे । जाते हुए राह में दया करना । तुमने की । तुमने मेरे आख़िरी दिनों को जीने लायक बना दिया ।”*
मॉनिटर की आवाज़ सीधी रेखा बन गई ।
*श्मशान में उनके दाह-संस्कार के समय थे—कुल छः लोग -*
मैं,
तीन नर्स,
एक वकील,
और एक पूर्व छात्र ।
*तैंतालीस साल की शिक्षकी ।*
*बावन साल का दांपत्य ।*
*इक्यासी साल की ज़िंदगी ।*
*छह लोग ।*
मैंने कहा—
“अनिरुद्ध बाबू ने मुझे सिखाया-
*हर अजनबी किसी का पूरा संसार होता है ।*
*हर यात्री एक कहानी है ।*
*हर इंसान जी रहा है, मर रहा है, इंतज़ार कर रहा है—कोई उसे देखे ।*
उन्होंने मुझे 5000/- रुपये दिए थे जीवन की सड़क पर गाड़ी चलाने के लिए ।
*लेकिन जो शिक्षा दी—उसकी कीमत पैसे से कहीं ज़्यादा है ।*
"मानवता कोई *अतिरिक्त चीज़ नहीं । यही सब कुछ है ।”*
आज भी वो 5000/- रुपये मेरे ग्लव बॉक्स में रखे हैं । खर्च नहीं किए ।
*क्योंकि हर यात्री शायद अपनी आख़िरी यात्रा पर हो । हर अजनबी शायद आख़िरी विदाई दे रहा हो ।*
इसलिए अब मैं अलग तरह से गाड़ी चलाता हूँ ।
*पूंछता हूँ । सुनता हूँ । लोगों को देखता हूँ ।*
क्योंकि एक बुज़ुर्ग शिक्षक ने *एक कोमल रात माँगी थी-और एक अजनबी रुक गया था ।*
आप भी वो इंसान बनो ।
*आज रात कोई शायद अपनी आख़िरी यात्रा पर निकला हो—उसे कोमल बना देना ।*
,डॉक्टर कपिल अग्रवाल सब एडिटर

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