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कौन थे आदि गुरु शंकराचार्य? 5 रहस्य जो कर देंगे हैरान


आदि गुरु शंकराचार्य के बारे में हम सभी जानते हैं। इन्होंने न सिर्फ 4 मठों की स्थापना की बल्कि सनातन धर्म की रक्षा के लिए अखाड़े बनाए। इन्होंने ही बद्रीनाथ और केदारनाथ की पुनर्स्थापना भी की।

वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि पर आदि गुरु शंकराचार्य की जयंती हर साल मनाई जाती है। इस बार पंचांग भेद के चलते ये पर्व 21 और 22 दो दिनों तक मनाया जाएगा। आदि गुरु शंकराचार्य को भगवान शिव का अवतार माना जाता है क्योंकि उन्होंने अपनी कम उम्र में ही अनेक ऐसे कार्य किए, जो किसी साधारण मनुष्य के बस की बात नहीं है। आदि गुरु शंकराचार्य कौन थे, उनका जन्म कहां हुआ, इसके बारे में कम ही लोगों को बता है। आगे जानिए आदि गुरु शंकराचार्य से जुड़ी खास बातें…

कौन थे आदि गुरु शंकाराचार्य?

धर्म ग्रंथों के अनुसार आदि गुरु शंकाराचार्य का जन्म 788 ईस्वी में केरल के कालड़ी गांव में नम्बूदरी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम शिव गुरु और माता का नाम आर्याम्बा था। इन्हें साक्षात भगवान शिव का अवतार ही माना जाता है क्योंकि इनके द्वारा किए गए कार्य कोई साधारण व्यक्ति नहीं कर सकता था।

बचपन में ही पढ़ लिए सारे वेद

जिस उम्र में छोटे बच्चों को ठीक से लिखना-पढ़ना नहीं आता, उस उम्र में यानी 8 वर्ष की अल्प आयु में ही आदि गुरु शंकराचार्य ने सारे वेद पढ़ लिए थे, साथ ही उन्हें ये सभी वेद कंठस्थ भी हो गए। इतनी कम उम्र में वेदों का अध्ययन करना साधारण बात नहीं थी, इसलिए इन्हें दिव्य शक्ति के रूप में लोगों ने स्वीकार किया।

अर्थ- आदि गुरु शंकराचार्य ने 8 वर्ष की आयु में चारों वेदों पढ़ लिए थे। 12 वर्ष की आयु में उन्होंने सभी शास्त्रों का अध्ययन कर लिया। 16 वर्ष की आयु में शांकरभाष्य की रचना की और 32 वर्ष की आयु में उन्होंने शरीर त्याग दिया।

4 मठों की स्थापना की

आदि गुरु शंकराचार्य के समय सनातन धर्म की स्थिति ठीक नहीं थी। अन्य धर्म इस पर हावी हो रहे थे। तब आदि गुरु शंकाराचार्य ने 3 बार पूरे भारत की यात्रा की और मठ-मंदिरों की स्थापना की। देश के 4 मठ भी इन्हीं की देन है। केदारनाथ और बद्रीनाथ की पुर्नस्थापना भी आदि गुरु शंकाराचार्य ने ही की थी।

कनकधारा स्त्रोत से करवाई सोने की बारिश


एक बार आदि गुरु शंकराचार्य एक गरीब ब्राह्मण के घर दान लेने गए। उस ब्राह्मण के पास कुछ भी नहीं था, लेकिन फिर भी उसने एक सूखा आंवला उन्हें दान में दे दिया। उसके मन में दान की भावना देख आदि गुरु शंकराचार्य उसी समय कनकधारा स्त्रोत की रचना की जिससे देवी लक्ष्मी ने प्रसन्न होकर उस गरीब व्यक्ति के घर सोने की बारिश कर दी।

                                के.वी. शर्मा,

                          संपादक और लेखक


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