भारतीय सेना का वो `महान` जनरल, जिसने कोई जंग नहीं हारी; `आलू-प्याज` की तरह छील डाले थे चीन-PAK और पुर्तगाल
भारतीय सेना का इतिहास बहादुरी से भरा हुआ है. सैनिक से लेकर अधिकारियों तक के कई ऐसे किस्से हैं, जिनके बारे में जानकर आप गर्व से भर जाएंगे. आज हम भारत के ऐसे महान जनरल के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसने कभी कोई जंग नहीं हारी, उसने चीन-PAK और पुर्तगाल को आलू-प्याज की तरह छील डाला था.भारतीय सेना के इतिहास में कई ऐसे नाम हैं, जिनकी कहानियां सुनकर आपके रोंगटे खड़े हो जाते हैं. जनरल सगत सिंह उन्हीं महान योद्धाओं में से एक थे. वे सिर्फ एक सैनिक नहीं, बल्कि एक ऐसे कमांडर थे. उन्होंने गोवा मुक्ति संग्राम (1961) में पुर्तगाल, नाथू ला (1967) में चीन और 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध में पाकिस्तान को धूल चटाई थी.
वो जनरल, जिसने कोई जंग नहीं हारीवे ऐसे 'महावीर' जनरल थे, जिन्होंने कभी कोई जंग नहीं हारी. वे सेकंड लेफ्टिनेंट पद से आर्मी में भर्ती हुए थे और लेफ्टिनेंट जनरल के पद से रिटायर हुए. वे 30 नवंबर 1976 को आर्मी से रिटायर हुए और 26 सितंबर 2001 को दिल्ली में उनका निधन हुआ. वे ऐसे साहसी कमांडर थे, जिनकी तैनाती मात्र से ही पुर्तगान, चीन और पाकिस्तान जैसे देशों को धूल चटाई
सगत सिंह का जन्म 14 जुलाई 1919 को कुसुमदेसर गांव में हुआ था. यह गांव राजस्थान के चुरू जिले की रतनगढ़ तहसील में है. उस समय यह क्षेत्र बीकानेर रियासत का हिस्सा हुआ करता था. वे राठौड़ राजपूत परिवार से संबंध रखते थे. उनके पिता ठाकुर बृजलाल सिंह राठौड़ बीकानेर की प्रसिद्ध गंगा रिसाला (कैमल कोर) में सिपाही थे.
उनका पहला बड़ा पराक्रम 1961 के गोवा मुक्ति अभियान में देखने को मिला. उस वक्त तक देश अंग्रेजों से आजाद हो चुका था लेकिन पुर्तगाल ने गोवा को मुक्त करने से इनकार कर दिया. उसकी सेना गोवा में मजबूती से जमी हुई थी. सरकार ने पहले बातचीत के जरिए पुर्तगाल को मनाने की कोशिश की लेकिन जब वह नहीं माना तो उसके खिलाफ पुलिस एक्शन करने का निर्देश दिया.
गोवा मुक्ति अभियान कहने को तो पुलिस एक्शन था. लेकिन असल में यह भारतीय सेना का अभियान था. इस ऑपरेशन को सगत सिंह लीड कर रहे थे. कहते हैं कि जब कई अधिकारी धीमी रणनीति अपनाना चाहते थे, तब सगत सिंह ने जोखिम उठाते हुए पुर्तगाली सेना पर सीधा और तेज आक्रमण करने का निर्णय लिया. उनके इस फैसले ने दुश्मन को संभलने का मौका ही नहीं दिया और कुछ ही समय में गोवा आजाद हो गया.
सगत सिंह बचपन से ही निडर और जुझारू स्वभाव के रहने वाले थे. गांव के खुले माहौल में पले-बढ़े सगत सिंह में कठिन परिस्थितियों से लड़ने की क्षमता बचपन से ही विकसित हो गई थी. जब उन्होंने भारतीय सेना में कदम रखा, तब किसी को अंदाजा नहीं था कि यह साधारण सा दिखने वाला जवान आगे चलकर इतिहास रच देगा. ट्रेनिंग के दौरान ही उन्होंने अपने साहस और नेतृत्व की झलक दिखा दी थी.
16 के बदले मारे चीन के 300 जवान
उनकी बहादुरी का स्वाद चीन ने भी जल्द ही चखा. वर्ष 1967 में सिक्किम के नाथू ला दर्रे पर संघर्ष हुआ. 1962 के युद्ध में छल-कपट के जरिए भारत को हरा चुकी चीनी सेना वहां बॉर्डर पर लगातार दबाव बना रही थी. इसकी वजह भारतीय सेना की ओर से की जा रही तारबंदी थी, जिसका चीनी सेना विरोध कर रही थी.
इससे माहौल बेहद तनावपूर्ण था. एक दिन चीनी सैनिकों ने भारतीय पोस्ट पर गोलीबारी शुरू कर दी. जिसमें कई भारतीय जवान शहीद हो गए. इससे स्थिति गंभीर हो गई. जैसे ही यह बात बात जनरल सगत सिंह को पता चला तो उन्होंने घबराने के बजाय तुरंत जवाबी कार्रवाई का आदेश दिया. उनके नेतृत्व में भारतीय सेना ने तोपों के जरिए चीनी सेना पर इतनी जोरदार जवाबी फायरिंग की कि चीनी सेना पीछे हटने पर मजबूर हो गई.
कहते हैं कि यह संघर्ष 4 दिनों तक चला, जिसमें भारतीय सेना के 16 और चीनी सेना के 300 से ज्यादा जवान मारे गए. 1962 के बाद यह पहली बार था कि चीनी सेना को इतनी बुरी तरह मार झेलनी पड़ी थी. उसने संघर्षविराम के लिए सफेद झंडा फहराया, जिसके बाद सेना ने अपनी तोपों का मुंह बंद किया.
यह वो मौका था, जब सगत सिंह ने दिखा दिया कि भारत अब पीछे हटने वाला देश नहीं है. उनके इस साहसिक कदम ने सीमा पर भारत की स्थिति को मजबूत कर दिया और सैनिकों का मनोबल भी बढ़ा. भारतीय सैनिक समझ गए कि चीनी अजेय नहीं हैं. अगर सटीक रणनीति और साहस के साथ पलटवार किया जाए तो उन्हें मजा चखाया जा सकता है. हालांकि सरकार से अनुमति न लेने पर उन्हें कोपभाजन भी बनना पड़ा.
'मेघना हेली ब्रिज' रणनीति से चौंक गया पाकिस्तान
इसके बाद पाकिस्तान के पिटने की बारी थी. वर्ष 1971 के भारत-पाक युद्ध जनरल सगत सिंह पूर्वी मोर्चे पर तैनात थे. उनके सामने हालात बेहद जटिल थे और दुश्मन मजबूत स्थिति में था. उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती मेघना नदी थी, जो बहुत चौड़ी और खतरनाक थी.
ऐसे में सेना अगर रुटीन तरीके से चलती तो उस नदी पर पुल बनाकर उसे पार करना पड़ता. ऐसा करने में समय बहुत लगता और दुश्मन हमला कर सकता था. लेकिन सगत सिंह ने एक ऐसा फैसला लिया, जिसने युद्ध की दिशा ही बदल दी.
उन्होंने हेलीकॉप्टर के जरिए सैनिकों को नदी के पार उतारने की योजना बनाई. यह 'मेघना हेली ब्रिज' रणनीति थी, जिसका पाकिस्तान को भान तक न लग सका. रात के अंधेरे में हेलीकॉप्टर उड़ते रहे और सैनिकों को एक-एक करके दुश्मन के पीछे उतार दिया गया. जब पाकिस्तानी सेना को इसका पता चला, तब तक भारतीय सैनिक उन्हें चारों तरफ घेर चुके थे.
एक रणनीति से पाकिस्तान के कर दिए 2 टुकड़े
इस रणनीति से दुश्मन पूरी तरह घबरा गया. लेकिन उनसे भिड़ने के बजाय भारतीय सेना बायपास करके तेजी से आगे बढ़ती हुई ढाका तक पहुंच गई. भारत की इस स्ट्रेटजी से पाकिस्तान बुरी तरह भौंचक्का रह गया. उसे उम्मीद नहीं थी कि उसके मजबूत सुरक्षा घेरे को तोड़कर भारतीय सेना राजधानी ढाका तक पहुंच जाएगी. लेकिन ऐसा हो चुका था और भारतीय सेना, पाकिस्तानी आर्मी को घेर चुकी थी.
जनरल सगत सिंह के नेतृत्व में भारतीय सेना ने चेतावनी दी कि वह सरेंडर कर दे. ऐसा न करने पर उससे बेरहमी के साथ कुचल दिया जाएगा. उस वक्त तक पूर्वी पाकिस्तान के आसमान पर भारतीय वायुसेना का कब्जा हो चुका था और भारतीय सेना राजधानी ढाका को घेरे खड़ी थी. ऐसे में पाकिस्तानी सेना के सामने कोई चारा नहीं था और उसे आखिरकार सरेंडर करना पड़ा. जिससे बांग्लादेश एक स्वतंत्र देश बना.
जनरल सगत सिंह की यही खासियत थी कि वे जोखिम लेने से नहीं डरते थे. वे समस्या के बजाय समाधान की ओर सोचते थे और नए-नए तरीके ईजाद करते थे. उनकी वीरता, निर्णय क्षमता और नेतृत्व कला को आज भी भारतीय सेना में पढ़ाया जाता है. उनकी कहानी हमें सिखाती है कि असली जीत वही हासिल करता है, जो मुश्किल समय में भी साहस और बुद्धिमत्ता से काम लेता है.
(यह आइटम के.वी. शर्मा एडिटर विशाखा संसद तेलुगु न्यूज़पेपर और विशाखापत्तनम दर्पण हिंदी न्यूज़पेपर विशाखापत्तनम आंध्र प्रदेश ने इकट्ठा किया है)

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