हाथ में ज़रीब है
सोच बे अजीब है,
हाथ में ज़रीब है।
चेहरा है बुझा बुझा,
और वो रकीब है।
सोज़ की कमाँ है क्या,
कौन दिन श'ईब है।
भूल गर सुधार की,
ठौर बा करीब है।
सोच गर वही रही,
'राज' फिर नसीब है।
बाबू चुप हो जाना
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छन्न पकैया छन्न पकैया, बाबू चुप हो जाना,
देखो सारे खेल खिलौने, छोड़ो अब तो गाना।
छन्न पकैया छन्न पकैया, लाड़ प्यार अब छोड़ो,
किस घर जन्म लिया हूँ बतला,काहे नाता जोड़ो।
सोचा था आने से पहले, कोई अफ़सर होगा,
शायद कोई भटका भूला, या डाकू कि दरोगा।।
छन्न पकैया छन्न पकैया, खोया पाया माना,
देखो सारे खेल खिलौने, छोड़ो रोना गाना।
घूर रहा है भाई सबको , आँखे जा कुम्हलाई,
चलीं अम्मा अब किस छोर में, पूछ रही है ताई।
जोकर बन बैठा किस घर में, पढ़ने को मैं सारा,
सब झूठे लगते मुझको तो, चढ़ता मुझको पारा।
छन्न पकैया छन्न पकैया, जो सोचा हो पाया,
अब किलकारी मेरी देखो , जिसको तुमने खोया।
सौंप दिया मोबाइल जैसे, तात की कृपा भारी,
अम्मा सपने देखे वैसे, पढ़ लूँ पुस्तक सारी।
हे प्रभु सिद्ध हो जन्म मेरी, महिमा बड़ी न्यारी,
राज छेड़े है वीडियो में , अकड़ बदल के यारी?
छन्न पकैया छन्न पकैया, अले.. अले.. ले सोना,
सुन बापू को मुस्काता वह, कहता है मत रोना।
छन्न पकैया छन्न पकैया, बापू चुप हो जाना,
वैसे मैं तो खेल खिलौना, छोड़ो अब तो गाना।
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©रामा श्रीनिवास 'राज़' 'बंगाली'
बेंगलुरु
: गुल्लक
अटकन भटकन कैसी उलझन
गुल्लक फूटी पैसे खन-खन।
सुन मम्मी उस तक दौड पडी
अब्बू के नाक चश्मा चढ़ी।।
छोड़ रसोई भागी अम्मी
हाय तोड़ डाली फिर निकम्मी।
सहमी बिटिया मुस्काती तब
अब्बू देखे करार में जब।
देख, जल गयी सारी रोटी,
गुल्लक से किस्मत खोटी।
पहली तारीख को दिन बचे,
छोटी पेंसिल तब तक चले।
सलमा फिर तुम क्या गाती हो,
नया बहाना रोज बनाती हो।
गिनकर दो गुल्लक के पैसे,
छ: रुपये काफी है वैसे।
अब्बू की मुस्कान समझ पाती,
आज फिर अम्मी डाँट खायी।
बिटिया को पढ़ने लिखने दो,
शेष बचे वेतन के दिन दो।
कुछ देर बाद अम्मी बोली,
तेरी बिटिया नहिं अति भोली।
चॉकलेट टॉफी रसना की,
न डाँटो मुझ पे बेकार की।
बिटिया निकली बड़ी सयानी,
जा बोली गोद में - सुनो नानी।
अम्मी को तुम भी मत डाँटो !
गुल्लक के सारे तुम बाँटो।
मुझको किड्डी बैंक मँगाना,
चाबी खोले जो तहखाना।
अम्मी रोती, देखो छुपकर,
अब्बू पढ़ रहे न्युज़पेपर।
नानी बोली- चुप हो पगली,
आने तो तारीख दे पहली।
अम्मी को तब खूब सुनाऊँ,
अपने लिए शाल मँगवाऊँ।
दोहा-पंचक
बिन इच्छा मुश्किल सदा, इस धरती पर जीत।
जो आलस साधे मिटा, गुनता जीवन रीत।।१
दुनिया अपने नाम हो, हर यौवन की चाह।
सच्चा बादशाह वही, जिसमें थाह अथाह।।२
अभिलाषा-पथ में सदा, अनेक अँकटी शूल।
यदि धीरज तुम जीत के, सङ्कट सारे भूल।।३
ज्यों करते हैं कामना, होते चकनाचूर।
सपने बिकते नहीं, साधन त्यों भरपूर।।४
राज मनोरथ साधिये, अर्थ रूप में खोज।
भेद लक्ष्य का जोर हो, जैसे राजा भोज।।५
दोहा परख
"जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं।
प्रेम गली अति सांकरी, जामे दो न समाहिं॥"
संत कबीर जी का यह दोहा मात्र अहम् (मैं)और ईश्वर (हरि) प्राप्ति के बीच की कड़ी को नहीं दर्शाता बल्कि जीवन के लिए लालायित वे सभी उपलब्धियों के लिए भी सत्यार्थ सिद्ध है। आज भी मनुष्य यदि अपनी पदवी या धनिक होने के गर्व से अपना रौब जमाना चाहे तो निश्चय ही उसकी हानि तय है। मैं- अर्थात् अहम् या गर्व न तो पदवी के गौरव की रक्षा करती है और ना ही उसकी संपदाओं की। संपदाओं से केवल अर्जित धन ही नहीं बल्कि वे सभी तथ्य आते हैं जिन कारणों से उसकी महानता हासिल करने में सहायक है। जैसे-समाज की टिप्पणी, मित्रों की निकटता, आदि। उसके मित्र - समाज आदि के विलुप्त होते ही व्यक्तिगत आर्थिक स्थिति का कमजोर होना दूर नहीं होता। यही फार्मूला बड़ी बड़ी कंपनियां अपनाते आ रही हैं दूजे से आगे निकल जाने हेतु, भले ही अवांक्षनीय तरीके हों, मौका यही रहता कि फलां के सिर पे घमंड का भूत अब सवार हो।
अभिव्यक्ति_मन_की
बला टली आप टली समझो
बला टली आप टली समझो,
सुकूँ जरा और बढ़ी समझो।
समझ समझ साथ वक्त कटता ,
समझ लिये बिरादरी समझो।
बयां ज़रूरी है दर्दे दिल का,
लबों जमा मुख्तारी समझो।
नज़्रें मिली खूब मिली लेकिन
अगा चमक चिंगारी समझो।
सुना करो 'राज़,' कोई तुम्हें,
यूं ना दिलों सुहावनी, समझो।
न मानते उसूलों को जहां
जुदा हुए तो तबाही समझो ।
रामा श्रीनिवास राज़

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