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इंसान में इंसानियत

 इंसान में इंसानियत के बारे में अब्दुल कलाम की सुनाई आखिरी कहानी एक पिता और बेटा एक मंदिर में गए, और जब बेटे ने दरवाज़े पर खंभों पर शेर के चेहरे खुदे हुए देखे तो वह डर गया। वह डर के मारे चिल्लाया, "पिताजी, शेर दौड़कर हमें मार डालेगा।" फिर पिता ने अपने बेटे को पास लिया और कहा, "डरो मत बाबू, ये तो बस मूर्तियां हैं, ये हमारा कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगी।" लड़के ने पूछा, "भगवान उसी रूप में हमारा भला कैसे कर सकते हैं?" ये बातें सुनकर पिता ने यह बात अपनी डायरी में लिख ली। उस दिन से लेकर आज तक, मेरे पास उनके सवाल का कोई जवाब नहीं है। लेकिन तब से, मैंने मूर्तियों में नहीं बल्कि इंसानों में भगवान को ढूंढना शुरू कर दिया..... भगवान तो नहीं मिले, लेकिन इंसानियत मिल गई, .......!!


के.वी.शर्मा एडिटर विशाखा संदेशम और विशाखापत्तनम दर्पण हिंदी न्यूज़ पेपर विशाखापत्तनम आंध्र प्रदेश

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