दुनिया का तरीका है हमारे सामने हमें "डांटना"। हमारे पीछे हमें "डांटना"। जब हम ठीक हो जाएं तो "रोना"। जब हम परेशान हों तो "हंसना"। हमसे "मीठे" तरीके से "बात करना" हमारी पीठ पीछे हमें "छुरा घोंपना" है।
सारे सवाल मन से आते हैं। मन को सुलझाओ, सवालों को नहीं, मन को समझने के बाद कोई सवाल नहीं रहता, चुप्पी ही जवाब है।
आप जो काम करते हैं, वे आपको नहीं बांधते, आप तभी बंधेंगे जब आपको कामों में दिलचस्पी होगी। अगर कोई इच्छा नहीं है, तो कोई बंधन नहीं है।
कुछ मिनटों तक चलने वाले टेंशन वाले, तनाव वाले, इमोशनल, कुछ समय के हालात में हमेशा रहने वाले फैसले न लें।
बहस, विरोध, समस्याओं का कारण यह है कि कुछ लोग सोचते हैं कि उनमें खास, दुर्लभ महानता है। (किसी में कोई खासियत नहीं है, सब कुछ मिट्टी में मिला हुआ है।)
आप ड्रामा की दुनिया के इस सपने को तब तक असली समझते रहते हैं, जब तक आप इस सपने से जाग नहीं जाते, और जब आप जागते हैं, तो आपको यह अनुभव होता है कि यह सब बेकार है।
हम मिट्टी को बर्तन में बदल देते हैं, उस खालीपन में कुछ भरने के लिए। लेकिन वह खालीपन वाला तत्व, बर्तन बनने से पहले भी वहीं होता है, बनने के बाद भी, सब कुछ उस आसमानी तत्व में होता है, वह बदलता नहीं है। मिट्टी और रूप कुछ भी नहीं पहनते।
के· वी· शर्मा,
लेखक एवं संपादक

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