संविधान खुद कब्रिस्तान बन गया है..
इसके काम करने का तरीका शैतानों का अड्डा है..
न्यायपालिका ही एक कला है जो गायब है..
जब लोकतंत्र की पूरी नींव ही ढह रही है
*_प्रेस की आज़ादी और कहाँ है.._*
अब जो भी लिखा जाएगा, हंगामा तो होगा ही!
*_जब चिट्ठी लिखी जाएगी_*
*_यह किसके हाथों में कैदी है.._*
किसके हाथ में इसकी ज़िम्मेदारी है..
_किस ज़ालिम हाथ में कलम कैदी है.._
चिट्ठी के दिन गए..
मालिकों की मतलबी ज़ंजीरों के बीच, खबरें.. देखो लिखने वाले ने कैसे अपना काम खो दिया है और कर्म का पैर बेकार हो गया है!
जो खबर आप लिखते हैं..
किसी और के विचार..
किसी और का नुकसान..
*_आपकी खबर_*
*_किसी और की बकवास.._*
आपके बॉस के लिए बकवास..
आपकी छठी इंद्री और कहाँ है..
सूखा सार..
इसका सेंसेक्स गिर गया है!
कलम तलवार से ज़्यादा तेज़ होती है
उस ज़माने की कहावत थी..
अब पानी की बोतल है...
पैसे कम हैं...
ज़िंदगी भारी है..
लेकिन अगर आप चार खत लिखते हैं, तो वो एक कागज़ का टुकड़ा है..
*_ये मज़ाक है..!_*
*_अगर आप अपनी कलम तेज़ करना चाहते हैं, तो आप डरते हैं_*
गिद्धों के राज में,
आज़ादी की इज़्ज़त होती है..
बड़े लोगों के राज में
*_लिखने की आज़ादी..एक श्राप है_*
दोनों खोखले हैं..
*_ये सिस्टम बेहतर नहीं हो रहा है!_*
*_खतों पर पाबंदियों की ज़ंजीरें.._*
*_खबरों पर नियमों की पाबंदियां.._*
आप जो खबर लिखते हैं
वो एक के लिए पॉज़िटिव होती है
और दूसरे के लिए नेगेटिव..
ये पॉज़िटिव..नेगेटिव
आपकी कलम जो आपकी कमर तोड़ती है
क्या ये नहीं है
ईमानदारी से समय..
अगर बॉस को पसंद नहीं है..
अगर उसके लीडर को पसंद नहीं है..
आपका लिखते हुए..
उस शाम अखबार में
*_तुम्हारा टाइम नहीं दिखेगा.._*
*_यही टाइम है...!_*
और क्या कहेगी
तुम्हारी अंतरात्मा..
*_अगर तुम तपस्या कर रहे हो_*
*_बॉस की 'गवाही'..!!??_*
जैसा कहते हैं..
सिक्के का दूसरा पहलू भी होता है..
*_वह भी तुम्हारे पास होना चाहिए_*
*_सेल्फ-कंट्रोल.._*
तुम्हारी आज़ादी फ्री नहीं है..
तुम्हारी लिखाई में प्योरिटी..
तुम्हारे प्रति कमिटमेंट..
ज़रूरी..
*_तभी तुम्हारी कलम.._*
*_हमारी जाति की इज्ज़त.._*
भगवान हमें करप्शन की बाढ़ दे!
के.वी.शर्मा संपादक

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