जब रात होती है
तो एक दिव्य स्त्री
अपने विशाल नीले घर में
लाखों-करोड़ों दीपक जलाती है
जब दिन ढलता है
तो एक दिव्य तेज वाला पुरुष
अपने सुनहरे रथ पर सवार होकर
उसके घर में प्रवेश करता है
और उसके लाखों-करोड़ों दीपकों की रोशनी को
अपनी चमक से फीका कर देता है
वे स्त्री और पुरुष दोनों ही
अपने दिव्य स्वामी के आदेशों का पालन करते हैं
कुछ लोग उन्हें ईश्वर कहते हैं
तो कुछ उन्हें
प्रकृति देवी कहते हैं
यह कविता विशेष रूप से पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न से सम्मानित पीवी नरसिम्हा राव जी को समर्पित है!
के· वी· शर्मा
लेखक एवं संपादक

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