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पुराणों के अनुसार जगन्नाथ रथ यात्रा का संबंध भगवान श्रीकृष्ण,


पुराणों के अनुसार जगन्नाथ रथ यात्रा का संबंध भगवान श्रीकृष्ण, उनके भाई बलराम और बहन सुभद्रा से है। यह यात्रा भक्तों को सांसारिक बंधनों से मुक्ति और मोक्ष दिलाने वाली मानी जाती है। पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर में इसका विशेष महत्व बताया गया है। 

पौराणिक कथाओं और शास्त्रों में इसके महत्व को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:

स्कंद पुराण और ब्रह्म पुराण: इन पुराणों में स्पष्ट उल्लेख है कि जो भी श्रद्धालु रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ के रथ (नंदीघोष) को खींचता है या दर्शन करता है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे सीधे वैकुंठ धाम (मोक्ष) की प्राप्ति होती है। 

गुंडिचा यात्रा (मौसी का घर): पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार देवी सुभद्रा ने द्वारका घूमने की इच्छा व्यक्त की। तब भगवान श्रीकृष्ण और बलराम उन्हें अपने रथों पर बैठाकर नगर भ्रमण के लिए निकले। रास्ते में वे अपनी मौसी के घर, 'गुंडिचा मंदिर' (गुंडिचा बाड़ी) गए, जहाँ वे सात दिनों तक रुके। इसी प्रसंग की स्मृति में यह यात्रा निकाली जाती है। 

राजा इंद्रद्युम्न की कथा: स्कंद पुराण के अनुसार, सतयुग में राजा इंद्रद्युम्न ने एक विशाल मंदिर का निर्माण करवाया था। तब भगवान विष्णु ने उन्हें आज्ञा दी कि वे वर्ष में एक बार अपने भाई-बहनों के साथ बाहर आएं और भक्तों को दर्शन दें। 

जाति और धर्म से परे समानता का संदेश: पुराणों और हिंदू दर्शन के अनुसार, रथयात्रा सामाजिक भेदभाव मिटाकर समानता और सर्व-समावेशकता का प्रतीक है। इस दौरान भगवान स्वयं अपने गर्भगृह से बाहर आकर भक्तों के बीच जाते हैं, जहाँ हर जाति, वर्ग और धर्म का व्यक्ति रथ की रस्सियों को खींचने में भाग ले सकता है।



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