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भगवान के बचे हुए कपड़े – हर भक्त को पता होनी चाहिए ये बातें*_

 


🔸 *बचे हुए कपड़े क्या हैं?*

बचे हुए कपड़े एक ऐसा कपड़ा होता है जो भगवान को चढ़ाने के बाद भक्तों को आशीर्वाद के तौर पर दिया जाता है। आजकल, ये ज़्यादातर शॉल, स्कार्फ, उत्तरीयम, धोती, साड़ी और रविका कपड़ों के रूप में दिए जाते हैं।

🔸 *कब चढ़ाया जाता है?*

भगवान के दर्शन के बाद, वैदिक विद्वानों के आशीर्वाद के दौरान, मंदिर के अधिकारी सम्मानपूर्वक बचे हुए कपड़े चढ़ाते हैं, या खास सेवाओं, त्योहारों और दान करने वालों के सम्मान जैसे मौकों पर।

🔸 *बचे हुए कपड़ों की खासियत।*

यह कोई आम सम्मान का कपड़ा नहीं है। यह भगवान की मौजूदगी में चढ़ाए जाने के बाद भक्त को मिली ईश्वरीय कृपा का प्रतीक है। इसलिए, इसे एक पवित्र भेंट मानना ​​चाहिए।

🔸 *कैसे लें?*

हमारी परंपरा है कि इसे दोनों हाथों से लें और सिर झुकाकर प्रणाम करें। यह कपड़े को प्रणाम करना नहीं है, बल्कि भगवान की कृपा को प्रणाम करना है।

🔸 *इसे कैसे संभालकर रखें?*

इसे पूजा के कमरे या किसी साफ़ जगह पर सम्मान के साथ रखना चाहिए। इसे लापरवाही से आम कपड़ों के साथ मिलाकर भगवान का तोहफ़ा समझकर नहीं रखना चाहिए।

🔸 *इसे कब पहनना शुभ है?*

मंदिर जाने, पूजा, व्रत, पारायण, होम, यज्ञ, उपनयन, शादी, गृहप्रवेश, गुरु पूजा, वेद पारायण और दूसरे धार्मिक कामों के दौरान इसे साफ़-सुथरा रहकर पहनना शुभ होता है।

🔸 *क्या इसे आम इस्तेमाल के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है?*

बचे हुए कपड़े को रोज़ाना पहनने के बजाय सिर्फ़ शुभ और धार्मिक मौकों पर ही इस्तेमाल करना एक सम्मान की बात है।

🔸 *किस हालत में इसे न पहनना बेहतर है?*

अशुद्धि के समय, गंदे होने पर, सोते समय या किसी ऐसे तरीके से जिसे शर्मनाक तरीके से इस्तेमाल किया जाता है, इसे न पहनना बेहतर है।

🔸 *क्या इसे धोया जा सकता है?*

सभी मंदिरों में एक जैसी परंपरा नहीं होती। कुछ इसे धोकर इस्तेमाल करते हैं, जबकि दूसरे इसे वैसे ही संभाल कर रखते हैं। सबसे अच्छा है कि वे अपने मंदिर की परंपरा को अपनाएं।

🔸 *अगर यह घिस जाए तो क्या करें?*

इसे कूड़ेदान में फेंकने के बजाय सम्मान के साथ फेंक देना चाहिए। इसे ज़मीन में दबा देना या मंदिर की परंपरा के अनुसार फेंकना बेहतर है। पर्यावरण की सुरक्षा का भी ध्यान रखना चाहिए।

🔸 *बचे हुए कपड़े की असली शान*।

इसकी महानता इसे पहनने में नहीं है; बल्कि भक्ति, विनम्रता और पवित्रता के साथ इसका सम्मान करने में है। यह हमें हमेशा भगवान की कृपा की याद दिलाता है।

🔸 *नोट.*

बचा हुआ कपड़ा जिस तरह से चढ़ाया जाता है, वह हर मंदिर में एक जैसा नहीं हो सकता। लेकिन यह किसी भी रूप में मिले, हर भक्त का यह कर्तव्य है कि वह इसे भगवान की कृपा मानकर स्वीकार करे और इसका सम्मान करे।

🙏*"बचा हुआ कपड़ा सिर्फ़ एक कपड़ा नहीं है... यह भगवान की कृपा का प्रतीक है। इसका सम्मान करना भगवान की कृपा का सम्मान करने जैसा है।"*

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🙏

के.वी. शर्मा, एडिटर, विशाखा प्रकाशन और विशाखापत्तनम दर्पण हिंदी समाचार पत्र, विशाखापत्तनम द्वारा संग्रहित आइटम


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