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जीवन ही संघर्ष है

 


से रोशनी की ओर

सुबह से शाम तक

रोशनी से अंधेरे की ओर

कोई दीया बिना पिघले नहीं जला

यही सब ज़िंदगी की लड़ाई है

कितना अजीब

डेवलपमेंट से बुढ़ापे तक

एक अंकुर जहाँ गिरा

एक चक्कर जो चक्कर लगाकर सर्कल पूरा करता है

ज़िंदगी जो बीच में नहीं छूटती

अनुभव वो है जो रास्ते में मिलता है

यही सब ज़िंदगी की लड़ाई है

कितना अजीब

शून्य से अनंत तक

अनंत से अनंत तक

मुश्किल सपने भी पानी बनकर सच होते हैं

खुशी के आँसू उनके नाम होने चाहिए

शुरू से शुरू तक, ये चाहत

यही सब ज़िंदगी की लड़ाई है

कितना अजीब

हारे तो अकेले रह जाओगे

जीते तो लोग घिरे रहेंगे

गहरी खाई में

अगर अपना लक्ष्य पा लिया 

तो खूबसूरत हो जाओगे

एक इंसान की दो परछाईं

यही सब ज़िंदगी की लड़ाई है

कितना अजीब

                        के.वी. शर्मा 

                          संपादक

विशाखापत्तनम दर्पण और विशाखा संदेश समाचार पत्रिका विशाखापत्तनम

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