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अगर परिवार का सिस्टम खत्म हो जाए



क्या आदमी का भाई बचेगा?

इस दुनिया में, आदमी के लिए पहला मंदिर परिवार है…

पहली टीचर माँ है…

पहला सहारा पिता है…

पहला दोस्त भाई या बहन है…

पहला प्यार बहन या बहन है…

लेकिन आज, अगर वही परिवार धीरे-धीरे खत्म हो रहा है…

अगर आदमी जीता भी है, तो ज़िंदगी मर जाती है।

पता नहीं क्यों...

पता नहीं कब शुरू हुआ...

लेकिन घर में हंसी कम हो गई है...

बातें कम हो गई हैं...

मन दूर हो गए हैं...

एक ज़माना था, जब बच्चे खाना खिलाने के लिए अपनी मां के हाथ का इंतज़ार करते थे...

अब वही मां अपने बेटे से दो मिनट बात करने से डरती है...

"मां का दिल कांप रहा है, सोच रही है कि वह क्या कहेगी या किस बात पर उसे गुस्सा आएगा...

एक ज़माना था, जब पिता घर आते थे, तो बच्चे दौड़कर उनसे गले मिलते थे...

अब पिता घर पर होते हुए भी बच्चे अपने फोन पर रहते हैं..

पिता की आंखों में बस यही सवाल है कि "क्या मैंने पैसे कमाकर प्यार खो दिया..

मैं उनके लिए बस एक ATM मशीन हूं..

वो दिन गए जब भाई-बहन एक-दूसरे के लिए जान दे देते थे...

अब वे एक गज ज़मीन के लिए मर रहे हैं ताकि खून बहे...

वो दिन गए जब बहनें एक-दूसरे के दर्द में रोती थीं...

अब समय नहीं है त्योहारों पर भी फ़ोन...

पति-पत्नी के बीच जहाँ प्यार होना चाहिए, वहाँ घमंड का राज है..

“सॉरी” शब्द के खत्म होने से,
कई परिवार कब्रिस्तान बनते जा रहे हैं..

कितना बेरहम है
कि माँ भी अपने बच्चों से नफ़रत बढ़ा रही है...

बेटा अपने बाप पर हाथ उठाने की नौबत तक पहुँच गया है..

ये सीन देखकर लगता है कि इंसान बड़ा हो गया है या इंसानियत मर गई है.

सब घर पर हैं. लेकिन प्यार नहीं है.

डाइनिंग टेबल है. लेकिन साथ में खाने वाले लोग नहीं हैं. भले ही उनमें वो दिल न हो.

हज़ारों रुपये के फ़ोन हैं
लेकिन “कैसी हो माँ?” पूछने का प्यार नहीं है.

आज हम अपने बच्चों को सब कुछ सिखाते हैं.

लेकिन हम सिर्फ़ “फ़ैमिली वैल्यूज़” सिखाना भूल गए हैं...

हम रैंक ला रहे हैं. लेकिन सिर्फ़ खून के रिश्ते बनाए रखने के लिए सिलेबस पढ़ाना भूल रहे हैं.

हमने उन्हें पैसे कमाना तो सिखाया, लेकिन लोगों का दिल जीतना नहीं सिखाया..

अब बड़े-बड़े घर हैं.. लेकिन उनमें लोग नहीं रहते.. महंगे बिस्तर हैं..

लेकिन चैन की नींद नहीं आती..

जन्मदिन पर सैकड़ों मैसेज आते हैं.. लेकिन उनकी आँखों में देखकर दुआ देने वाले माँ-बाप नहीं होते...

उस दिन इंसान रोता है.. लेकिन उन आँसुओं को पोंछने वाला हाथ नहीं होता...

परिवार सिर्फ़ खून का रिश्ता नहीं होता...

एक पवित्र जगह जहाँ दिल मिलते हैं...

अगर यह टूट जाए, तो यह देश नहीं होता। दुनिया खत्म हो जाएगी...

इसलिए...

आज से,
अपने मम्मी-पापा से पाँच मिनट प्यार से बात करें...

अपने भाई-बहनों को गले लगाएँ...

अपनी बहनों को प्यार से नमस्ते करें...

पति-पत्नी को जीतने की कोशिश नहीं करनी चाहिए... बल्कि साथ रहने की कोशिश करनी चाहिए..

क्योंकि,
जब आप मरेंगे, तो अर्थी उठाने वाले बहुत होंगे...

लेकिन जब आप ज़िंदा होंगे, तो दिल उठाने वाले परिवार के लोग होंगे!

चलो परिवार की रक्षा करें।

चलो दिल को ज़िंदा रखें...

नहीं तो, घर तो कल की पीढ़ी के लिए रह जाएँगे...

लेकिन "घरवाले" रह जाएँगे...!!

परिवार एक फूल की तरह है..

यह कौन सा फूल है? फूल को फूल से अलग मत करो और उस फूल की कीमत और इज़्ज़त मत छीनो..
उसकी खूबसूरती खराब मत करो..

अगर परिवार में लोगों के बीच प्यार नहीं है, तो परिवार की कोई कीमत नहीं है..

प्लीज़ छोटे-मोटे "EGO" और झगड़ों में मत पड़ो और
रिश्ते मत तोड़ो..

प्लीज़ अकेले मत रहो...

सोचो दोस्तों..

हमने पढ़ाई की है..

हम बड़ी-बड़ी नौकरियाँ कर रहे हैं..

हमारे हाथ में पैसे हैं..

लेकिन माँ, बाप, भाई, बहन के बिना अकेली ज़िंदगी...

अनाथों जैसी अकेली ज़िंदगी..

असुरक्षा की भावना..

क्या अकेली ज़िंदगी
ज़रूरी है?

हमारे बड़े-बुज़ुर्ग यूं ही नहीं कहते थे कि साथ मिलकर हम खुश हैं...

कितना तजुर्बा दिखा है, क्या हम इस हालत में हैं कि यह समझ नहीं पा रहे हैं कि इसका 'अंदर' क्या है..

क्या हमें ऐसे ही जीते रहना चाहिए और खुद को धोखा देना चाहिए...
एक पल शांति से सोचो..
बदलाव के लिए अपना पहला कदम उठाओ...
दस लोगों के लिए मिसाल बनो...
यह भरोसा पाओ/रखो कि तुम्हारे लिए या खुद तुम्हारे लिए "चार" हैं...

                               के· वी· शर्मा      

                             लेखक एवं संपादन      

                                विशाखापट्टनम

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